Friday, 18 January 2019

कद्दू की खेती कैसे करें।लोकी की खेती कैसे करें

कद्दू की खेती।

जैसा कि आप जानते हैं कि लोग आजकल कद्दू वर्गीय सब्जी को बढ़ावा देने लगे हैं इसमें कद्दू पेठा लौकी टिंडो आदी सब्जी आती है जिसमें कद्दू और लौकी मुख्य है जैसे अगेती फसल के लिए लोग दिसंबर और जनवरी के महीने में पैकिंग में बीज लगाकर नर्सरी तैयार करते हैं जो कि सही वक्त आने पर उनके पौधे तैयार होते हैं और 25 से 30 दिन अगेती सब्जी प्राप्त करते हैं यह लोग वो करते हैं जिनके बाजार में भाव सब्जी आने के बाद कम हो जाते हैं और अगेती सब्जी में अच्छा मुनाफा हो जाता है जैसे लौकी की और कद्दू की खेती 6 से 8 महीने की होती है। और कुछ लोग 5 में से 8 महीने तक इस की बिजाई करते हैं 
ताकि दीपावली तक इसकी डिमांड बढ़ जाए और अच्छा मुनाफा मिले


3 g cutting -- वैसे तो आजकल 3G कटिंग के नाम से लोग इसकी कटिंग करने लग गए हैं पर इसका एक ही तरीका है कि इसकी जॉब मुख्य डाली होती है उसको आगे बढ़ने ना दे उसको काटकर मिट्टी में नीचे रख दें जिससे उसकी जो अगली जो जड़े हैं वह वहां से शुरू हो जाती है और उससे पहले ब्रांच डालिया निकलनी शुरू हो जाती है।

बीज की मात्रा प्रति बीघा

800 से 900 ग्राम 

बीज का उपचार-

 बिजाई के 10 दिन के अंदर blitox,coppeर ऑक्सी क्लोराइड तथा रिडोमिल गोल्ड को 2ml प्रति लीटर के हिसाब से जड़ों में छिड़काव करें।

बिजाई करने का तरीका।

बीज की बुवाई-एक छोटी पोटली में बीज को भर ले। और 1 से 3 दिन तक उसमें कैप्टन दवा 2ml प्रति लीटर के हिसाब से पानी में मिलाकर रखें।

पौधे से पौधे की दूरी 40×40 centimetre
बेड का साइज 6 फिट चौड़ाई।
बेड की ऊंचाई 15 सेंटीमीटर
बीज को इतना ऊपर लगाए कि पानी की सील पहुंच जाए जड़ों तक।
पानी के निकास के लिए नालियां बड़ी बनानी जरूरी है जिससे जड़ गलन ना हो।

बिजाई का सही समय।

अगेती किस्में (early वैरायटी)-फरवरी-मार्च
साधारण समय(Normally)-April May June
पिछेती किस्म (Late varieties)-July August

अच्छी किस्मे (improved varieties)

1-Mhhycco घिया
2-kashi bahaar

3-kashi Ganga

4-pusa sandesh (high yield)



सिंचाई ( Irrigation)

कद्दू में पानी की जरूरत होती है 3 दिन के अंतराल में सिंचाई करनी जरूरी है। सिंचाई नहर के पानी से करें तो ज्यादा लाभकारी होती है और ट्यूबवेल से yield  कम होती है पानी कम से कम लगाना चाहिए जिससे पानी खड़ा ना हो सकें और जड़ गलन भी ना हो। नहर के पानी से फसल ज्यादा दिन तक बिना पानी के रह सकती है और बोर के पानी से कम जल्दी ही पानी की जरूरत पड़ जाती है।
सिंचाई हमेशा शाम के वक्त 3:00 से 4:00 बजे के बाद ही करनी चाहिए।

कीटनाशक (ferilizer)

पत्तों पतियों पर भूरे धब्बे जो कि जिंक की कमी से आ जाते हैं जिसमें जिंक 5 किलो प्रति बीघा में मिट्टी के साथ मिलाकर छिड़काव करें।
Corrogen-यह कीटनाशक पत्तों रेंगने वाले कीड़े (कीट)लगते हैं या फिर कीड़े हो तो 1 ग्राम 2 लीटर के हिसाब से छिड़काव करें.
Fortuner-यह फर्टिलाइजर लागत कम हो या फिर फूल झड़ने की शिकायत हो और भूरे रंग के पिसू जैसे कीड़े देखने को मिले तो 12 ग्राम 20 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें और ध्यान रहे कि या तो सुबह सुबह अर्ली मॉर्निंग में या फिर शाम को फूल खुलने के बाद ही इसकी सप्रे करें।1-Red pumpkin beetal--  Marshal 2ml per litre 
2-पद गलन रोग---कैप्टन दवा 2ml प्रति लीटर के हिसाब से छिड़काव करें। या फिर बलाई टॉक्स 50 copper oxychloride और रिडोमिल गोल्ड इन तीनों दवाइयों का घोल बनाकर छिड़काव करें प्रति लीटर में 2ml के हिसाब से मिलाएं।

पैदावार( yield)


बरसात के मौसम में कद्दू की सबसे ज्यादा पैदावार होती है और आमतौर पर एक बीघे में 100 से डेढ़ सौ किलो रोजाना होती है। इसकी कद्दू की लागत 60 से 65 दिनों में शुरू होती हैं। और 7 से 8 महीनों तक पैदावार होती है

Kakdi ki kheti kese kre

Kakdi ki kheti..

Kakdi ek sabji ke roop me kaam lene wala fal h.wese isko salad me bhi kha skte h



Kakdi ki farming feb se August ke beech me kr skte h..iski bijai kanak ki fasal ke baad kr skte hai..ek acre me iska beej 500-600 gm .chahiye hota h  wese to kai kisaan to iski beejai bed bnakar krte h jisme labour ka khrch hota h.or kuch kissan normally desi tarike se krte h.
Direct cotton bijai wali machine se.jisme ghas nikalta asaan hota h.or irrigation ki bhi jarurat nhi pdti..is me pani di demand bahut kam rhti h..kisaan bhai Apne khet me is ki bijai krne se pehle achi tarah sinchai kr le jis se jameen me nami bni rhe. 


बीज की मात्रा।(SEED REQUIRED)


अगेती फसल लेंने के वक़्त-500 gm (February)
सही समय पर बिजाई--400gm प्रति बिघा (march_april)

बिजाई का समय 

  वैसे तो इसका समय है कपास और नरमा की फसल के साथ बीजा जा सकता है जिसको हम इंटरक्रॉपिंग भी कहते हैं और अगेती फसल और अच्छा भाव लेने के लिए इसको दूसरे महीने में बीजें।और मुख्य तौर पर फरवरी से जुलाई तक बिजाई की जाती है।


               अच्छी किस्में(improoved verieties)

1-पंजाब no 1
2-पंजाब no-2
3-देसी
4-मटकाचर
5-सफेद ककड़ी
6-बिरानी काकडी आदि किस्में होती है।

         सिंचाई।(irrigation)

वैसे तो कड़ी में पानी की जरूरत नहीं पड़ती पर अगर आप की जमीन बिरानी या अन कमांड है तो आप को 2 दिन के अंतराल में पानी लगाना आवश्यक है अगर आप की जमीन नरमा या चावल वाली है तो इसमें पानी लगाने की जरूरत नहीं पड़ती फूल आने तक आपको उसमें पानी लगाना उचित नहीं है क्योंकि इस जमीन में नमी पहले से ही बहुत होती है तो ककड़ी को इतनी नमी बहुत होती है अगर आपने जमीन की जो रोनी नहर के पानी से की हो तो आपको इसमें पानी की जरूरत नहीं होगी अगर आपने रोनी ट्यूबवेल के पानी से की है वो तो आपको पानी लगाना पड़ सकता है तो आप उसके हिसाब से आप चेक कर सकते हैं आप इसका पता कैसे लगा सकते हैं कि आपकी जो ककड़ी की फसल है सूख रही है या फिर फूल झड़ रहे हैं अगर आपके ककड़ी की फसल की फ्लोरिंग झड़ रही है तो आप पानी लगाएं।

       खाद( fertilizer)

 वैसे तो ककड़ी की फसल में खाद की जरूरत नहीं होती क्योंकि यह एक खुद ऑर्गेनिक खाद के उपयोग में की जाने वाली फसल है। अगर आपको इसमें जरूरत लगे तो आप डीएपी 25 किलो प्रति बीघा हिसाब से छिड़काव कर सकते हैं और गोबर की खाद भी इसमें f y m है जो आप अपनी जरूरत अनुसार आप जैसे कि आप कनक या फिर और फसलों में डालते हैं इससे नुकसान भी हो सकता है क्योंकि ज्यादा खाद डालने से या फिर ज्यादा जरूरत ना होने के कारण पत्ते बड़े हो जाते हैं और फूल कम आते हैं yield भी कम होती है तो उसके हिसाब से आप थोड़ा चेक करके भी देख ले खा डालकर की कामयाब है या नहीं।

     पैदावार (Yield) प्रति बीघा।

ककड़ी की फसल की वैसे तो कोई yield की लिमिट नहीं होती जैसे इसमें 3* बार फूल आते हैं जैसे 15 15 दिन के बाद अगर आपने इस की बिजाई की है तो 45 से 60 दिन के अंतराल में इसमें फ्लावरिंग शुरू हो जाती है और राजस्थान के गंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में रोजाना इसकी पैदावार एक बीघे के अंदर 3 से 5 कुंटल तक हो जाती है क्योंकि इसकी जो पैदावार और इसकी बढ़ोतरी वह तेजी से होती है और इस को तोड़ना भी जरूरी है सुबह और शाम को अगर इसको ना तोड़े तो ककड़ी फट जाती है और खेत मैं फंगस आने की संभावना हो जाती है जिससे आवारा पशुओं को इसकी सुगंध आती है और इसको खाने के चक्कर में वह खेत में नुकसान भी कर जाते हैं।
बिरानी क्षेत्रों में इसकी 1 दिन में डेढ़ सौ से ढाई सौ किलो तक भी हो जाती है। वैसे मुख्य तौर पर इसकी पैदावार 40 से 50 दिन तक ही होती है उसके बाद कम होने लग जाती है फिर जहां पर 3 से 4 कुंटल होती थी वहां से 120 किलो या फिर ज्यादा ज्यादा 150 किलो तक ही हो पाती है।
मुख्यतौर पर इसकी पैदावार 400 से साढे 400 कुंटल तक हो जाती है

Important thinks। इसे जरूर पढ़ें।

राजस्थान में कई किसान इसकी ज्यादा पैदावार और और कम लागत की खेती करने के लिए कपास बिजाई की मशीन से इस की बिजाई करते हैं जिससे इसमें घास निकालना आसान हो जाता है क्योंकि जो नरमे में सिलर की मदद से घास निकालते हैं वैसे ही 25 दिन के बाद इसमें से घास निकाला जा सकता है और नुकसान भी कम होता है उसके बाद ककड़ी की बेल बड़ी हो जाती है उसके बाद  spray की मदद से घास को दबाया जा सकता है

 कीटनाशक दवाईयां आदि का उपयोग।

ककड़ी की फसल में वैसे तो कोई इतनी ज्यादा दिक्कत नहीं होती क्यों यह एक ऑर्गेनिक फसल भी है और इसमें अगर कोई पत्ते मोड या फिर कोई फंगस की शिकायत हो तो मैनकोज़ेब m64 का 200 ग्राम 50 लीटर पानी के हिसाब से कर सकते हैं और इसकी सप्रे एक हफ्ते में एक बार करें और अगर लागत कम हो तो एनपीके 18 या फिर एनपीके 19 1 किलो एनपीके को 100 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।

ज्यादा जानकारी के लिए आप कॉल करें। 80 944 80 700

Monday, 20 March 2017

गेंदे की खेती कैसे करें।

Hlo,kisaan bhaiyo.jesa ki aap jante h ki aj kal har kisaan chahta h ki wo jyada SE jyada pesa kmaye or ameer bne.ye sambhav h krna pr is k liye kuch technic h Jo janana bahut jruri h..aaj hum baat krte h. Floriculture ki.Jo fulo ki kheti ko kehte h usme bahut si kheti aesi h Jo India me ki jaati h or kai foreign countries me hi ki jaati h..
India me jese.marigold, rose,jaesmeen,guldaudi,rajni gandha,curcuma etc ye Jo flowers h ye bahut hi demand wale flowers h jinki bajaar me demand rhti h..
 Aaj hm baat krenge marrygold ki.Jo gende ke naam SE pehchaana jata h..





जलवायु और भूमि (temprature and climate)=जिस भूमि का पी.एच. मान 7.0 से 7.5 के बीच होता है वह भूमि खेती के लिए अच्छी मानी जाती है.

उन्नतशील प्रजातियां(varieties)=अफ्रीकन गेंदा जैसे कि क्लाइमेक्स, कोलेरेट, क्राउन आफ गोल्ड, क्यूपीट येलो, फर्स्ट लेडी, फुल्की फ्रू फर्स्ट, जॉइंट सनसेट, इंडियन चीफ ग्लाइटर्स, जुबली, मन इन द मून, मैमोथ मम, रिवर साइड ब्यूटी, येलो सुप्रीम, स्पन गोल्ड,,मैक्सन गेंदा जैसे कि टेगेट्स ल्यूसीडा, टेगेट्स लेमोनी, टेगेट्स मैन्यूटा आदि,, फ्रेंच गेंदा जैसे कि बोलेरो  गोल्डी, गोल्डी स्ट्रिप्ट, गोल्डन ऑरेंज, गोल्डन जेम, रेड कोट, डेनटी मैरिएटा, रेड हेड, गोल्डन बाल आदि चौथे संकर किस्म की प्रजातिया जैसे की नगेटरेटा, सौफरेड, पूसा नारंगी गेंदा, पूसा बसन्ती गेंदा आदि.



खेती की तेयारी,बीज का छिर्काव /और बीज की मात्रा


)=खेत में क्यारी बना ले और उसको सही ढंग से लेवल करके सडी गोबर खाद डाले और बीज छिरक दे। और कल्रतिवेट कर दे क्यों की पानी लगाने के दोरान बीज पानी के साथ साथ तेर न जाये इस्लिये ।मिटटी में मिलाना आवश्यक ह।बीज की मात्रा

आजकल बहुत technique आ चुकी जेसे ट्रे आती है। नर्सरी तेयार करने के लिए बाजार में आपको आसानी से मिल्जेगी जिसकी मदद से हम अछी तरह इरीगेशन ओर उसके बाद प्लांटिंग कर सकते है। transplanting के दोरान हमें पोधे लगाने में दिकत नही आती। अगर हमारे पास प्लांट ट्रे ह तो आसानी से transplant कर सकते है।जेसा की आप देख सकते ह फोटो में।


        बीज की मात्रा

गेंदे की बीज की मात्रा किस्मों के आधार पर लगती है. जैसे कि संकर किस्मों का बीज 700 से 800 ग्राम प्रति हेक्टेयर तथा सामान्य किस्मों का बीज 1.25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है. भारत वर्ष में इसकी बुवाई जलवायु की भिन्नता के अनुसार अलग-अलग समय पर होती है. उत्तर भारत में दो समय पर बीज बोया जाता है जैसे कि पहली बार मार्च से जून तक तथा दूसरी बार अगस्त से सितम्बर तक बुवाई की जाती है. और हाइब्रिड variety का सिर्फ 300 ग्राम बीज 1 hactar में लगता ह।
कई दिनों बाद कुछ इस तरह दिखेंगे छोटे पोधे
जिसको हम पंजीरी  कहते है।

रोपाई


रोपाई। गेंदे के पोधे लाइन में लगाए जाते ह।या क्यारिया बनाकर रोपे जाते ह। लाइन से लाइन की दुरी 45-50से मी। और पोधे से पोधे की दुरी60से मी।ये सिर्फ अफ्रीकन गेंदे मे और अन्य किस्मो में होती ह।क्यों की गेंदे का पोधा ज्यादा जगह में फेलता ह।
पोधे की रोपाई इस तरह करे












 खाद एव उर्ववक


250 से 300 कुंतल सड़ी गोबर की खाद खेत की तैयारी करते समय प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देना  चाहिए इसके साथ ही अच्छी फसल के लिए 120 किलोग्राम नत्रजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस तथा 80 किलोग्राम पोटाश तत्व के रूप में प्रति हेक्टेयर देना चाहिए. फास्फोरस एवं  पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा खेत की तैयारी करते समय अच्छी तरह जुताई करके मिला देना चाहिए. नत्रजन की आधी मात्रा दो बार में बराबर मात्रा में देना चाहिए. पहली बार रोपाई के एक माह बाद तथा शेष रोपाई के दो माह बाद दूसरी बार देना चाहिए.



रोग और नियंत्रण


गेंदा में अर्ध पतन, खर्रा रोग, विषाणु रोग तथा मृदु गलन रोग लगते है. अर्ध पतन हेतु नियंत्रण के लिए रैडोमिल 2.5 ग्राम या कार्बेन्डाजिम  2.5 ग्राम या केप्टान 3 ग्राम या थीरम 3 ग्राम से बीज को उपचारित करके बुवाई करनी चाहिए. खर्रा रोग के नियंत्रण के लिए किसी भी फफूंदी नाशक को 800 से 1000 लीटर पानी में मिलाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए. विषाणु एवं गलन रोग के नियंत्रण हेतु मिथायल ओ डिमेटान 2 मिलीलीटर या डाई मिथोएट  एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए.

कीट और नियंत्रण


गेंदा में कलिका भेदक, थ्रिप्स एवं पर्ण फुदका कीट लगते है इनके नियंत्रण हेतु फास्फोमिडान या डाइमेथोएट 0.05 प्रतिशत के घोल का छिड़काव 10 से 15 दिन के अंतराल पर दो-तीन छिड़काव करना चाहिए अथवा क़यूनालफॉस 0.07 प्रतिशत का छिड़काव आवश्यकतानुसार करना चाहिए



कटाई और तुराई


जब हमारे खेत में गेंदा की फसल तैयार हो जाती है तो फूलो को हमेशा प्रातः काल ही काटना चाहिए तथा तेज धूप न पड़े फूलो को तेज चाकू से तिरछा काटना चाहिए फूलो को साफ़ पात्र या बर्तन में रखना चाहिए. फूलो की कटाई करने के बाद छायादार स्थान पर फैलाकर रखना चाहिए. पूरे खिले हुए फूलो की ही कटाई करानी चाहिए. कटे फूलो को अधिक समय तक रखने हेतु 8 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान पर तथा 80 प्रतिशत आद्रता पर तजा रखने हेतु रखना चाहिए. कट फ्लावर के रूप में इस्तेमाल करने वाले फूलो के पात्र में एक चम्मच चीनी मिला देने से अधिक समय तक रख सकते है.



पैदावार


गेंदे की उपज भूमि की उर्वरा शक्ति तथा फसल की देखभाल पर निर्भर करती है इसके साथ ही सभी तकनीकिया अपनाते हुए आमतौर पर उपज के रूप में 125 से 150 कुंतल प्रति हेक्टेयर फूल प्राप्त होते है कुछ उन्नतशील किस्मों से पुष्प उत्पादन 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होते है यह उपज पूरी फसल समाप्त होने तक प्राप्त होती है.


हमारा ये पोस्ट का लगा प्ल्ज़ कमेन्ट और ज्यादा जानकारी के लिए आप call कर सकते ह।8094480700



Monday, 18 April 2016

Adrak ki Kheti kese kre– अदरक की खेती


Agar aap Adrak ki vaigyanik kheti ki soch rahe hai to ise jarur se padhe aur jankari hasli kare. Adarak jise Ginger bhi bolte hai, iski saalon bhar acchi demand rahti hai aur isliye yah ek aisa farming business hai jise aap saalon bhar chala aur kama sakte hain. अगर आप अदरक की खेती करना चाहते है तो आपको बहुत ही फायदा हो सकता है क्योंकि इसकी खेती में बहुत ही कम खर्च में अधिक आमदनी होती है। अदरक की खेती को अगर कृषि वैज्ञानिको द्वारा बताये गए तरीको से किया जाए तो किसानो को अच्छी फसल की प्राप्ति हो सकती है। अदरक के तीन किस्म ऐसे है जो हमारे देश में भली भाती की जाती है एक सुप्रभात दूसरा सुरुचि और तीसरा सुरभी। तो आइये जानते है कैसे करे अदरक की खेती ।


कैसे करे अदरक की खेती  / How to do Ginger Farming

Agar sahi tarike se Adark ki kheti ki jay to is farming business se India mein accha kamaya jaa sakta hai. Jaisa hum sabhi jante hai ki Adrak ke kafi fayde hai aur har gharon mein iska prayog hota hai aur iski demand saalon bhar rahti hai. Scientific tarike se agar ginger ke farming ki jaye to ise ek business ke rup mein accha fayda mil sakta hai. To chaliye jante hai kaise kare Adrak ki sahi tarike se kheti:

भूमि का चयन और तैयारी

किसान चाहे तो अदरक की खेती किसी भी तरह के भूमि पर कर सकते है लेकिन उचित जल निकास वाली दोमट भूमि में अदरक की खेती को सबसे सर्वोतम माना जाता है। मांदा का निर्माण करना भी अदरक की खेती के लिए अच्छा होता है। मांदा निर्माण से पहले खेत की अच्छी तरह से जुताई कर के उसे भुरभुरा बना लेना चाहिए। अदरक की खेती को खरपतवार रहित रखने के लिए और मिट्टी को नरम बनाये रखने के लिए आवश्यकता अनुसार खेत की जुताई करते रहना चाहिए ।

जलवायु

कृषि वैज्ञानिको द्वारा अदरक की खेती ऐसे जगह पर करना चाहिए जहाँ नर्म वातावरण हो। फसल के विकास के समय ५० से ६० से.मी. वार्षिक वर्षा हो साथ ही भूमि ऐसी होनी चाहिए जहाँ पानी ना ठहरे और हल्की छाया भी बनी रहे ।



बीज की बुआई

बीज कंदों को बोने से पहले ०.२५ प्रतिशत इथेन, ४५ प्रतिशत एम और ०.१ प्रतिशत बाविस्टोन के  मिश्रण घोल में लगभग एक घंटे तक डुबाए रखना चाहिए । फिर दो से तीन दिनों तक इसे छाया में ही  सुखने दें। जब बीज अच्छे से सुख जाए तो उसे लगभग ४ से.मी. गहरा गड्ढा खोद के बो देना चाहिए । बीज बोने समय कतार से कतार की दूरी कम से कम २५ से ३० से.मी. और पौधों से पौधों की दूरी लगभग १५ से २० से.मी. होनी चाहिए। बीज के बुआई के तुरंत बाद उसके ऊपर से घांस फुंस पत्तियों और गोबर की खाद को डाल कर उसे अच्छे से ढक देना चाहिए इससे मिट्टी के अन्दर नमी बनाये रखना आसान होता है साथ ही अदरक के अंकुरन तेज धुप से बच सकते है ।

सिंचाई / जल प्रबंधन

अदरक की खेती में बराबर नमी का बना रहना बहुत जरुरी होता है इसलिए इसकी खेती में पहली सिंचाई बुआई के तुरंत बाद कर देनी चाहिए। फिर भमि में नमी बनाये रखने के लिए आवश्यकता अनुसार सिंचाई करते रहना चाहिए । सिंचाई के लिए टपक पद्धति या ड्रिप एरीगेशन का प्रयोग किया जाए तो और भी बेहतर परिणाम सामने आता है।

खाद प्रबंधन

अदरक की खेती में मिट्टी के जांच करने के बाद ही पता चलता है की कब ओर कितना खाद का प्रयोग करना चाहिए। अगर मिट्टी की जांच ना भी की जाए तो भी गोबर की खाद या कम्पोस्ट 20 से 25 टन , नत्रजन 100 किलो ग्राम / kg, 75 किलो ग्राम kg फास्फोरस और साथ ही साथ में 100 किलो ग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देनी चाहिए। इस खाद को देने के लिए, आप चाहे तो  गोबर या कम्पोस्ट को भूमि की तैयारी से थोड़े पहले खेत में सामान्य रूप से डाल कर अच्छे से खेत की हल से जुताई करनी चाहिए । नेत्रजन, फास्फोरस और पोटाश की आधी मात्रा बीज की बुआई के समय देना चाहिए और बांकी आधी को बुआई के कम से कम ५० से ६० दिनों के बाद खेत में डाल कर मिट्टी चढ़ा देना चाहिए ।

रोग नियंत्रण

अदरक की खेती को प्रभावित करने वाले दो रोग होते है :

मृदु विगलन
प्रखंध विगलन
इन रोगों के प्रकोप से पौधो के निचे की पत्तियां पीली पर जाती है और बाद में पूरा पौधा पीला हो कर मुडझा जाता है साथ ही भूमि के समीप का भाग पनीला और कोमल हो जाता है। पौधा को खीचने पर वो प्रखंड से जुड़ा स्थान से सुगम्बता से टूट जाता है। बाद में धीरे धीरे पूरा प्रखंड सड़ जाता है । मृदु विगलन रोग से बचाव के लिए भूमि में चेस्टनट कंपाउंड के ०.६ प्रतिशत घोल को आधा लीटर प्रति पौधे के दर से देते रहना चाहिए ।

कुछ रोग ऐसे भी होते है जिसकी वजह से पत्तियों पर धब्बे पर जाते है जो की बाद में आपस में मिल जाते है । इस रोग की वजह से पौधों की वृद्धि पर प्रभाव पड़ता है जिससे उपज कम हो जाती है । इस रोगकी वजह से पौधों की वृद्धि पर प्रभाव पड़ता है जिससे उपज कम हो जाती है । इस रोग से बचने के लिए बोर्डो मिश्रण का उपयोग ५:५:५० के अनुपात में किया जाना चाहिए।

Gulab ki Vaigyanik Kheti ki Jankari – गुलाब फूल की खेती


आइए हम जानते है की गुलाब की खेती करने की विधि क्या है।



गुलाब की खेती कैसे करे / How to start Rose farming business

Yahan do rai nahi hai ki kafi sare log ab kehti apna rahe hai aur accha paisa bhi kama rahe hai, jisme se ki gulab ki kheti bhi ek hai. Agar scientic tarike se rose farming ka business kiya jaye to naa kewal aap accha kama sakte hai balki kai logon ko rojgar bhi de sakte hain.

ऐसे और भी खेती के business हैं जैसे अनार की खेती, मशरुम की खेती, इत्यादि जिसकी जानकारी यहाँ दी गयी है |

भूमि का चयन

किसी भी चीज़ के खेती करने से पहले आपको भूमि का अच्छे से चयन और inspection करना होता है। इससे आपको गुलाब के फूल के खेती में सफलता प्राप्त होने की संभावना बढ़ जाती है। अगर आप अच्छे से तैयारी कर ले और मन बना ले, तो ऐसा माना जाता है की गुलाब की खेती किसी भी तरह के भूमि पर किया जा सकता है ।फिर भी जादातर कृषि वैज्ञानिको का कहना है   की गुलाब की खेती के लिए बालुई दोमट मिट्टी वाली भूमि का चयन करे जिसमे जल का निकास अच्छा हो। इससे फुल की अच्छी उत्पादन होती है । खेती शुरू करने से पहले भूमि की अच्छे से लगभग 6 से 7 पी.एच. तक का गहरा जुताई कर लेना चाहिए।

जलवायु

वैसे तो हमे गुलाब का फुल सालो भर देखने को मिलती है। लेकिन अगर आपको अच्छे और बड़े बड़े गुलाब के फुल चाहिए तो इसके लिए आप ठण्ड के मौसम में इसकी खेती करे। march के महीने में गुलाब के फुल की खेती करना सही होता है क्योंकि इस समय का तापमान कम होता है और कम तापमान की वजह से इस मौसम में फुल अच्छे से फूलते है। अगर april में तापमान कम होगा तो भी गुलाब अच्छी Quantity में खिलेगी। गुलाब के अच्छे उत्पादन के लिए अधिक मात्रा में धुप और नमी (moisture) की जरुरत होती है।

गड्ढो की खुदाई और खाद

जब खेती के लिए जुताई का काम पूरा हो जाये तो पौधा रोपने की तैयारी करनी चाहिए। इस काम के लिए may और june का महिना सही होता है ।

सबसे पहले गहरे गड्ढे खोद ले। गड्ढा कम से कम 40 से 50 से.मि. गहरा होना चाहिए।
गड्ढा खोदने के बाद उसमे से सारे खरपतवार साफ़ कर लेना चाहिए।
उसके बाद गड्ढे को कम से कम 10 से 12 दिन के लिए खुला छोड़ दें इससे मिट्टी के सारे कीड़े मकोड़े और सारे (फफूंदी)fungus ख़त्म हो जायेंगे।
उसके बाद उस गड्ढे में कम से कम 25 से 30 से.मि. मोटाई कर के गोबर का खाद गड्ढे के ऊपर तक भर देना चाहिए।
फिर गड्ढे में मिट्टी भर कर उसमे पौधा रोप दें ।
पौधा रोपने समय दो पौधे के बिच की दुरी कम से कम 40 से 50 से.मि. होनी चाहिए ।
गुलाब की 5 किस्मे होती  है

हाईब्रिड टी (Hybrid Tea ) – इसमें बड़े बड़े फुल होते है और झारियां भी बहुत लम्बे घने होते है। इसकी एक और खास बात ये है की इसकी हर एक ताने में एक फुल जरुर से निकलते है।

फ्लोरीबंडा (floribunda) – हाइब्रिड टी के मुताबिक फ्लोरीबंडा किस्मो के फुल छोटे-छोटे होते है और इस किस्म के फुल एक साथ बहुत ज्यादा नहीं लग पते है।

पोलिएन्था (Polyanthas)  – इस किस्म के फूलों का shape हाइब्रिड टी और  फ्लोरिबंडा  से छोटा होता है  लेकिन गुच्छा  आकार में फ्लोरीबंडा किस्म से भी बड़ा होता है।

मिनिएचर (Miniature) – इस किस्म के पौधे को आप अपने घर पर भी गमले में लगा सकते है। इसके फूल और पत्ते दोनों हीं छोटे छोटे होते है।

लता गुलाब – हाइब्रिड टी और फ्लोरिबंडा गुलाबों की शाखाएँ लताओं की जैसे बढ़ती जाती है  जिसके कारण उन्हें लता गुलाब भी कहा जाता  है।

पौधे की सिचाई

पौधे की सिचाई बहुत ही जरुरी होती है। मौसम को देखते हुए पौधों की सिचाई करते रहना चाहिए। गुलाब की खेती में पौधा रोपने के तुरंत बाद सिचाई करना चाहिए। उसके बाद हर 15 दिन में सिचाई करना चाहिए।

किट पतंग से बचाव

माहू या चैंपा  नामक किट गुलाब के पौधों को नष्ट कर देता है । ये कीड़े छोटे आकार के होते है और जादातर january और february के महीने में लगते है । इस कीड़े के लग जाने से पौधा मुरझा जाता है इसकी वजह से फुल और कलियाँ झड़ जाते है।

शल्क कीट जो लाल भूरे रंग के दीखते है ये अक्सर जड़ के आसपास वाली शाखाओं में लगते है। ये किट पत्तो को नष्ट कर देते है ।

इन सब कीटो से बचने का तरीका ये है की आप नीम का काढ़ा बना कर  या फिर गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर 250 मि.ली. हर पम्प में डालकर फसल के चारो ओर छिड़क दे।

कटाई – छटाई

गुलाब के पौधे की कटाई छटाई लगभग एक साल बाद शुरू कर दी जाती है। सही समय पर सही तरीके से पौधे की कटाई छटाई करते रहने से अच्छे फुल की उत्पादन होती है। सूखे और कीटो से ग्रसित टहनियों को काट के हटा देना चाहिए। कटाई छटाई के बाद पौधे के कटे हुए सर पर ताजा गोबर को लगा देने से fungus नहीं लगता है

कृपा करके बताये की आपको ये जानकारी कैसे लगी।।

Tulsi ki Kheti (Holy Basil) ki Jankari – तुलसी


Aaj ke daur mein Tulsi ke paudhe ki kheti ek aisa business hai jise apnakar aap lakhon mein kama sakte hain | Ise Holy basil bhi bola jata hai. Aaye jante hai iski jankari detail mein | अन्य देशो के अपेक्षा Tulsi भारत में एक अती महत्वपूर्ण पौधा है। इसलिए तुलसी खेती में किसान को बहुत हीं कम लागत में अच्छा खासा benefit हो सकता है। सामान्य दिनों में tulsi का पत्ता 25 से 30 रूपए किलो बिकता है लेकिन वही तुलसी के पत्ते की कीमत ठंड के समय चार गुना अधिक हो जाता है। तुलसी की खेती करने वाले तुलसी के बीज को बाज़ार में बेच कर अच्छा रकम कमा लेते है । आइये जानते है कैसे तुसली की खेती करने से किसानो को अधिक मुनाफा हो सकता है ।



Tulsi ki Kheti Kaise Karen / How to do Holy Basil Harvesting

Aaj ke daur mein agar aap Tulsi ke kheti karte hain to yah maan kar chaliye ki yah fayde ka hi sauda hai. Pure India aur dusre countries mein Holy Basil ki acchi demand hai. Iski kheti karna aasan hai aur har mausam mein kiya jaa sakta hai. Aur quki tulsi ka use medicine banane mein bhi hota hai isliye is paudhe mein kam bimari lagti hai aur fasal acchti hoti hai. To chaliye jante hai tulsi ke kheti ki jankari.

भूमि का चयन / तैयारी
तुलसी की खेती हर तरह के भूमि पर की जा सकती है। खेती करने से पहले भूमि की अच्छे से जुताई कर के उसमे गोबर के खाद के साथ nitrogen,phosphorus और potash के मात्रा का भी प्रयोग करना चाहिए।

जलवायु
Tulsi की खेती सभी प्रकार की जलवायु में Suitable है लेकिन गर्मी में इसकी खेती को सर्वोत्तम माना जाता है। सर्दी के दिनों में कुहासे(fog) की वजह से तुलसी के पौधों को नुकसान पहुँचता है जिसकी वजह से उपज में कमी आ जाती है ।

पौधे का रोपन
तुलसी के बीजों बोने से पहले उसे एक controlled temperature में उगाया जाता है। पौधे में जैसे ही 3-4 पत्ते आने लगे उसे जड़ से उखाड़ कर खेत में रोप दिया जाता है। तुलसी के पौधे को रोपने के समय line से line की दूरी 1.5 फिट होनी चाहिए और पौधों से पौधों की दूरी भी 1.5 फिट की होनी चाहिए। पौधे के लगने के बाद time time पर उसकी निराई गुड़ाई भी करते रहना चाहिए तथा उसपर मिट्टी भी चढ़ाते रहना चाहिए ।

खाद प्रबंधन
तुलसी के खेती में खाद के लिए बहुत हीं कम खर्च होता है । इसकी खेती में खाद के रूप में गाय का गोबर तथा तुलसी की कटी पत्तियों का भी use किया जाता है। इसी के वजह से tulsi के खेती में लागत कम लगती है और benefit ज्यादा होता है ।

पौधे की कटाई
लगभग एक महीने में तुलसी का पत्ता काटने योग हो जाता है। तुलसी की कटाई 25 से 26 दिनों के अंतराल पर की जाती है जिसमे 5 से 6 inch पेड़ की कटाई की जाती है ।

रोग नियंत्रण

तुलसी में लगने वाले रोगों से नियंत्रण पाने के लिए लगभग 3ml दवा per litre पानी में mix कर 2 से 3 बार पौधों पर छिड़काव करना चाहिए । ठंड के मौसम में कुहासे(Fog) से भी तुलसी के पौधे को काफी हानि पहुंचता है। इसलिए ठंड के मौसम में कुहासे से बचाव के लिए डायथेम एम. 45 का छिड़काव भी खेतो में करना चाहिए जिससे की पौधे रोग मुक्त रहे और तुलसी की उत्पादन प्रभावित न  हो ।




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mushroom ki kheti

Mushroom Ki Kheti Kaise Kare Hindi Me

Mushroom woh sabzi hai jo protein se bharpur hoti hai. Iskay andar resha aur folic amla bhi hote hain jo swasthya ke liye bhaut labhdayak hote hain. Isliye sehat ke liye mushroom ko kahna bahut labhprad hota hai. Yahi karan hai ki mushroom aaj kal bahut lokpriya ho rahe hain aur bazar mein inka karobaar badh gaya hai. Isliye hi mushroom ki kheti aaj fayde ka karya hoti jaa rahi hai. Aaiye jaane ki Mushroom Ki Kheti Kaise Kare Hindi Me.

 
Mushroom Ki Kheti Kaise Kare
 Mushroom ugane ke liye mausam ka chayan
Bharat mein mushroom ko ugane ke liye aisa mausam chunyen jismen bahut ahik sardi nahin ho. Yani mushroom thand ke mausam mein nahin ugay jaate hain. Isliye mushroom ki kheti karne ke liye sahi mausam May se september hai. Mushroom ki fasal ko nami yukta vatavaran ki bhi zaroorat hoti hai jo in mahino mein milta hai. Mushroom ke liye vatavran mein 90 partishat tak nami acchi rahti hai. Mushroom ko bahar ya kamre ke andar dono hi jagah lagaya jaa sakta hai.

Mushroom ki kheti ke liye kyarion ki tayyari
Mushroom ki kheti ke liye etoan ya mitti ki kyariyan banai jaati hain. Yeh kyariyan 3 foot lambi, 1 foot chaudi aur 7 inch unchi hoti hain. In par seedhi dhoop ya barsaat nahin aaye iskay liye inke upar shade bana diya jaata hai. In kyariyon mein baans ke sahare dhan ki puaal rakhi jaati hai jis par mushroom ki kheti ki jaati hai. In dhaan ke puaalon ko pani mein dal diya jaata hai aur 12 se 16 ghanton tak bheegne diya jaata hai. Iskay baad unhen farsh par rakhkar unsay atirikt pani nikal diya jata hai. 

 Mushroom ko kaise boyen
Mushroom ke beej ko span kehte hain. Yeh bazaar se prapt kiye jaa sakte hai. Mushroom ke beejon ko bone ke liye pehle se banai gayi mitti ki panktiyon ya kyarion mein baans ke dhaanche rakhkar unke upar dhaan ke puaal ka gattha rakhen. Sabhi gathron ke siron ko baans se ek aur se baandh den. Ab is parat par mushroom ke beej bikher den. Beejon ke upar dhan ya gehun ki bhusi ya chane ka besan thodi si matra mein bikher den. Is pehli parat ke upar hi is tarah hi doosri, teesri aur chauthi parat banayen aur is dher ko kisis pardarshi plastic se dhak den. 

Mushroom  bone ke anya tarike
Yadi apke paas jagah kam hai to aap mushroom ko ek sidhi lambi jagah mein bhi uga sakte hain. Iska liye apko us jagah par rassi tangni padengi aur un rassiyon ke sahare apko thodi thodi jagsh chodkar dhan ki puaal ke gathre raknhe honge aur un par mushroom ke beej dalne honge. Is prakar mushroom ek seedhi lambai rassi ke sahare tange dhan ke puaal par ugenge. Iskay alaawa mushroom ko kamre ke andar bhi ugaya ja sakta hai. Ismay dhan ke puaal ko kamre mein rakhkar farsh aur deewaron par pani chidka jaata hai. Kamre ka taapmaan 34 se 38 degree celcius rakha jaata hai aur kamre ke andar nami ki matra 80 se 85 pratishat rakhi jaati hai. kamre ko 4-5 dinon ke liye band hi rakha jata hai.

 Mushroom ki sinchai
Mushroom bone ke 7-8 din baad is pure puaal ko 35 degree tapmaan ke aas paas rakhen. Jab mushroom ugane lagen to unke upar se plastic ki chadar hata den aur yadi puaal sukha lage to us par halka pani chdak den.  Mushroom ke beej bone ke lagbhag 3 saptah baad acche vikasit mushroom dikhne lagenge. 

Mushroom ki tayyar fasal
Jab muhroom ka upari sira jise jhilli bhi kehte hain fatne lage to smajh lena chahiye ki mushroom ki fasal tyyar ho gai hai aur usay nikala jaa sakta hai. Tab mushroomon ko to lena chahiye. Mushroom ki fasal lagbhag 12 dinon tak tyyar hoti rahti hai. 25 kilogram  geele pual mein lagbhag 4 kilogram mushroom prapt hote hain. Mushroom ke kheti ke liye banayi gayi kyaariyon mein se pratyek kyaari mein se 2 kilogram tak mushroom prapt ho jaate hain. Mushroom ki fasal bahut nazuk hoti hai aur inka bhandarn 2-3 dino ke liye hi kiya jaat hai.

How we start poultry farm in field

 राम-राम सभी किसान भाइयों को जैसा कि आप जानते हैं आज के टाइम में भारतीय किसान पोल्ट्री फार्म डेरी फार्म मछली फार्म बटेर पालन बतख पालन आदि यह...